/ Oct 29, 2026

आईआईटी मंडी का दावा: गोरखा भूकंप के बाद कमजोर हुआ लांगटांग ग्लेशियर, अब टूटा हिस्सा बना तबाही का कारण

मंडी/धर्मवीर-:नेपाल में हाल ही में आई भीषण बाढ़ और ग्लेशियर टूटने की घटना को लेकर आईआईटी मंडी के शोधकर्ता ने अहम दावा किया है।संस्थान के सैटेलाइट इमेजिंग और भूविज्ञान शोधकर्ता प्रो.डॉ. डेरिक्स पी.शुक्ला के अनुसार,हिमालय क्षेत्र में स्थित लांगटांग ग्लेशियर के टूटने की प्रमुख वजह जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि अप्रैल 2015 में नेपाल में आया विनाशकारी गोरखा भूकंप हो सकता है।उनका कहना है कि भूकंप के बाद ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा कमजोर होकर हैंगिंग ग्लेशियर के रूप में तब्दील हो गया था,जो करीब एक दशक बाद टूटकर नीचे आया और अपने साथ भारी मात्रा में मलबा व बड़े-बड़े बोल्डर लेकर बहा।

भूकंप के झटकों से ग्लेशियर की संरचना हुई कमजोर

प्रो. डॉ. शुक्ला के मुताबिक वर्ष 2015 में नेपाल में आए 7.9 तीव्रता के गोरखा भूकंप ने हिमालय के कई हिस्सों को प्रभावित किया था।इस दौरान टाबो ग्लेशियर और लांगटांग ग्लेशियर की संरचना पर भी असर पड़ा। भूकंप के कारण लांगटांग ग्लेशियर के दक्षिणी हिस्से का एक बड़ा भाग टूट गया था।इस घटना के बाद ग्लेशियर का कुछ हिस्सा अस्थिर होकर पहाड़ी ढलान पर लटक गया,जिसने बाद के वर्षों में हैंगिंग ग्लेशियर का स्वरूप ले लिया।

2015 में भी मची थी भारी तबाही

शोधकर्ता का कहना है कि गोरखा भूकंप के बाद लांगटांग ग्लेशियर के दक्षिणी मुख की ओर का हिस्सा टूटकर नीचे आया था। इस ग्लेशियर से निकले मलबे और बर्फ ने निचले इलाकों में भारी तबाही मचाई थी। गोंपा और लांगटांग सहित आसपास के क्षेत्र बर्फ, चट्टानों और मलबे की चपेट में आ गए थे। उस समय भी ग्लेशियर के टूटने से बड़ी मात्रा में मलबा नीचे की ओर आया था और स्थानीय स्तर पर जान-माल का भारी नुकसान हुआ था।

26 अगस्त को उत्तरी हिस्सा टूटकर नीचे आया

प्रो. शुक्ला के अनुसार बीते 26 अगस्त को लांगटांग ग्लेशियर के उत्तरी मुख की ओर का हिस्सा टूटकर नीचे आया।इस बार ग्लेशियर के साथ बड़ी-बड़ी चट्टानें, बोल्डर और भारी मलबा भी नीचे की ओर बहा।इसके चलते नेपाल के निचले इलाकों में अचानक भारी तबाही की स्थिति पैदा हुई। उनका कहना है कि ग्लेशियर का यह हिस्सा सामान्य तरीके से पिघलकर नीचे नहीं आया,बल्कि एक अस्थिर और लटकते हुए हिस्से के टूटने से अचानक बड़े पैमाने पर मलबा नीचे पहुंचा।

हैंगिंग ग्लेशियर सामान्य ग्लेशियर से अलग करता है तबाही

डॉ.शुक्ला ने ग्लेशियर टूटने की प्रक्रिया को समझाते हुए कहा कि सामान्य परिस्थितियों में जब किसी ग्लेशियर का हिस्सा टूटता या पिघलता है तो उसका प्रभाव अपेक्षाकृत एक दिशा में आगे बढ़ता है।लेकिन हैंगिंग ग्लेशियर की स्थिति अलग होती है।पहाड़ी ढलान पर अस्थिर होकर लटका हुआ बर्फ और चट्टानों का हिस्सा अचानक टूटने पर अपने साथ भारी मात्रा में मलबा लेकर नीचे की ओर तेजी से बढ़ सकता है।यही प्रक्रिया फ्लैश फ्लड जैसी स्थिति को जन्म देकर बड़े क्षेत्र में तबाही का कारण बन सकती है।

जलवायु परिवर्तन के तर्क पर उठाए सवाल

शोधकर्ता ने लांगटांग ग्लेशियर के टूटने को केवल जलवायु परिवर्तन से जोड़ने पर भी सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि यदि इस घटना का मुख्य कारण तापमान में बढ़ोतरी या जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना होता,तो आसपास के अन्य ग्लेशियरों में भी इसी तरह की घटनाएं देखने को मिलतीं। उनके अनुसार लांगटांग ग्लेशियर की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए वर्ष 2015 में आए गोरखा भूकंप के प्रभाव और उसके बाद ग्लेशियर में हुए संरचनात्मक बदलावों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

पिछले साल भी देखी गई थी फ्लैश फ्लड की घटना

प्रो.शुक्ला के मुताबिक लांगटांग ग्लेशियर के आसपास के क्षेत्र में पिछले वर्ष भी फ्लैश फ्लड की घटना सामने आई थी। उनका कहना है कि लगातार हो रही इन घटनाओं को देखते हुए ग्लेशियर की वर्तमान भौगोलिक और संरचनात्मक स्थिति का अध्ययन बेहद जरूरी है।सैटेलाइट तस्वीरों,भूगर्भीय आंकड़ों और क्षेत्र में हुए पुराने बदलावों के आधार पर यह समझने की कोशिश की जा सकती है कि ग्लेशियर किस तरह धीरे-धीरे अस्थिर हुआ।

आपदा के कारणों पर वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी

आईआईटी मंडी के शोधकर्ता का यह दावा नेपाल में हुई हालिया तबाही को लेकर एक अलग वैज्ञानिक दृष्टिकोण सामने रखता है। हालांकि ग्लेशियरों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को लेकर दुनिया भर में व्यापक शोध जारी है, ऐसे में किसी एक घटना के कारणों को निर्धारित करने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक और भूगर्भीय अध्ययन जरूरी होगा।लांगटांग क्षेत्र में वर्ष 2015 के भूकंप के बाद हुए बदलावों, ग्लेशियर की संरचना और हालिया टूटने की घटनाओं का तुलनात्मक अध्ययन इस आपदा के वास्तविक कारणों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

Ekta TSN

rahulkash03@gmail.com http://www.thesummernews.in

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