/ Oct 30, 2026

मानव बलि रोकने के लिए रानी ने दी थी सती बलि, तब से चली आ रही है..शिमला के धामी में अनोखी परंपरा

Shimla,21 October:-दीवाली के ठीक अगले दिन शिमला ज़िले के धामी के हलोग गांव में सदियों पुरानी अनोखी परंपरा के तहत ‘पत्थर मेला’आयोजित किया गया। इस बार भी हजारों की संख्या में लोग मां भद्रकाली मंदिर परिसर में इकट्ठा हुए और करीब 25 मिनट तक पत्थरों की बारिश चली। इस खेल में 60 वर्षीय सुभाष,कटैड़ू खुंद से, को पत्थर लगा और पारंपरिक मान्यता के अनुसार उनका खून मां काली को तिलक के रूप में चढ़ाया गया।

पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद रखी थी। मौके पर एम्बुलेंस और चिकित्सा दल भी मौजूद रहे।इस खेल में केवल स्थानीय खुंद के पुरुषों को ही भाग लेने की अनुमति होती है — महिलाओं और बाहरी लोगों के लिए इसमें भागीदारी वर्जित है।

पत्थर खेल का इतिहास

करीब 400 वर्ष पुरानी परंपरा के अनुसार, कभी धामी रियासत में महामारी और अनिष्ट घटनाओं से बचने के लिए नरबलि दी जाती थी। यह प्रथा रानी को स्वीकार नहीं थी, इसलिए उन्होंने इसे रोकने के लिए स्वयं सती होने का निर्णय लिया।सती होने से पहले रानी ने कहा था कि अब मानव बलि नहीं दी जाएगी — यदि मां काली को रक्त चढ़ाना है, तो वह पत्थर खेल के माध्यम से होगा। उसी स्थान पर आज ‘रानी का चौरा’ बना हुआ है, जहां हर वर्ष यह मेला आयोजित किया जाता है।

मां काली को अर्पित किया जाता है रक्त

रानी की इस परंपरा के तहत,आज भी लोग स्वेच्छा से पत्थर लगने की कामना करते हैं।उनका मानना है कि यदि उन्हें पत्थर लगता है और रक्त निकलता है,तो यह शुभ संकेत होता है और मां भद्रकाली उनसे प्रसन्न होती हैं।

क्या कहते हैं राजघराने और समिति के लोग

जगदीप सिंह राणा,राजघराने के उत्तराधिकारी ने बताया —यह हमारी आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है। रानी की स्मृति में यह पत्थर खेल आयोजित किया जाता है और हर साल हजारों लोग इस परंपरा को निभाने आते हैं।”

रणजीत सिंह कंवर, जनरल सेक्रेटरी,मेला कमेटी धामी ने कहा कि मेले की शुरुआत भगवान नरसिंह मंदिर से पूजा-अर्चना के साथ होती है। इसके बाद ढोल-नगाड़ों के साथ जुलूस निकलता है जो रानी के स्मारक तक पहुंचता है। वहां दोनों खुंदों के लोग एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं।

सुभाष (कटैड़ू खुंद), जिन्हें इस वर्ष पत्थर लगा, बोले —“मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि मां काली को अपने रक्त से तिलक चढ़ाने का अवसर मिला। जब तक जीवित हूं, इस परंपरा का हिस्सा रहूंगा।”

Ekta TSN

rahulkash03@gmail.com http://www.thesummernews.in

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