चंडीगढ़-:पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव एक बार फिर यह संकेत दे गए कि राज्य की राजनीति में सत्ता परिवर्तन अक्सर सिर्फ सरकार बदलने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह एक पूरे राजनीतिक दौर के अंत और नए अध्याय की शुरुआत का प्रतीक बन जाता है। वर्ष 1977 में वाम मोरचा का उभार और 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में आए ‘पोरिवर्तन’ ने इस राजनीतिक परंपरा को पहले भी स्थापित किया था। मौजूदा चुनाव में 293 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा को मिली 206 सीटों की बड़ी जीत राज्य की राजनीति में तीसरे बड़े बदलाव के रूप में देखी जा रही है, जिसकी पृष्ठभूमि कई वर्षों से तैयार हो रही थी।
यह जनादेश केवल चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन राजनीतिक सवालों का जवाब भी है जो लंबे समय से बंगाल की राजनीति के केंद्र में रहे। यह परिणाम बताता है कि कैसे वोट प्रतिशत और सीटों के समीकरण ने राज्य का राजनीतिक इतिहास बदल दिया। साथ ही यह भी दर्शाता है कि भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं की लगातार सक्रियता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शांत संगठनात्मक विस्तार ने पार्टी को हाशिए से मुख्यधारा की सत्ता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
साल 2011 में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ने बदलाव(पोरिवर्तन) की राजनीति के जरिए पश्चिम बंगाल की सत्ता हासिल की थी, जो मौजूदा चुनाव के नतीजे आते-आते अंसतोष की कहानी बयान कर गए। उससे पहले करीब 34 वर्षों तक वाम मोरचा का शासन रहा था। लोगों ने पोरिवर्तन की उम्मीद में ममता बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकार किया। ममता ने 184 सीटें जीतकर बंगाल की सियासत में अपनी अहमियत दिखाई थी।इसके बाद 2016 विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 211 सीटें जीतकर शानदार जीत दर्ज की थी और उसका वोट शेयर लगभग 44.9% रहा। वहीं, 2021 विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अपनी स्थिति और मजबूत करते हुए 213 सीटें जीतीं और वोट शेयर बढ़कर करीब 47.9% पहुंच गया। यानी यह कहना गलत होगा कि 2021 में तृणमूल का वोट प्रतिशत गिरा था। हकीकत यह है कि पार्टी चुनाव जीती और उसका वोट शेयर भी बढ़ा।हालांकि, इसी चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का बड़ा उभार देखने को मिला। भाजपा की सीटें 2016 में सिर्फ 3 थीं, जो 2021 में बढ़कर 77 हो गईं। वहीं उसका वोट शेयर लगभग 10.2% से बढ़कर 38%के करीब पहुंच गया।
इससे साफ संकेत मिला कि बंगाल की राजनीति अब पूरी तरह एकतरफा नहीं रही और राज्य में एक मजबूत विपक्ष उभर चुका है।एक समय था जब ममता केवल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री नहीं थीं, बल्कि वे राज्य की राजनीतिक कल्पना, जनआकांक्षाओं और बदलाव की सबसे बड़ी प्रतीक बन चुकी थीं। ममता बनर्जी उस दौर में आम लोगों की आवाज, संघर्ष की पहचान और परिवर्तन की उम्मीद बनकर उभरी थीं। सड़क से लेकर विधानसभा तक उनका संघर्ष, वामपंथ के खिलाफ उनकी आक्रामक राजनीति और खुद को “जनता की नेता” के रूप में स्थापित करने की उनकी क्षमता ने उन्हें बंगाल की राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया।लेकिन समय के साथ राजनीति बदलती गई और चुनौतियां भी बढ़ती गईं। सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के बाद अब उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार, प्रशासनिक कमजोरी, बेरोजगारी और राजनीतिक हिंसा जैसे मुद्दों को लेकर सवाल उठने लगे हैं।शासन को लेकर बढ़ा असंतोष लोगों को उम्मीद थी कि नई ममता सरकार भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी समस्याओं पर बेहतर काम करेगी। लेकिन समय के साथ यह धारणा बनी कि तृणमूल सरकार हर क्षेत्र में अपेक्षित सुधार नहीं कर पाई।
धार्मिक ध्रवीकरण की नींव
इन चुनाव परिणामों की नींव मतदान से महीनों पहले ही पड़ चुकी थी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सहित टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं के लगातार गैर-जिम्मेदाराना बयानों ने बंगाल की जनता में गहरा असंतोष पैदा किया। तृणमूल कांग्रेस तब विवादों के घेरे में आ गई जब मंत्री और वरिष्ठ नेता फिरहाद हकीम ने कोलकाता में एक अखिल भारतीय कुरान प्रतियोगिता के मंच से कहा, “जो लोग इस्लाम में पैदा नहीं हुए हैं वे दुर्भाग्यशाली हैं” और “इस धर्म को गैर-मुसलमानों के बीच फैलाया जाना चाहिए।” एक संवैधानिक पद पर बैठे नेता का यह वक्तव्य बंगाल की साझा संस्कृति के विरुद्ध था। दुर्गापूजा और ईद साथ मनाने वाले बंगाल में हिंदू बंगाली समाज ने इसे अपनी अस्मिता पर चोट माना। नाराजगी स्वाभाविक थी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस आग में घी डाला। एक सभा में उन्होंने कहा, “हम हैं इसलिए आप सब सुरक्षित हैं। अगर हम नहीं रहे, तो एक सेकंड में 12 बजा दिए जाएंगे।” यह बयान एक विशेष समुदाय को संबोधित करते हुए देखा गया। इसका सीधा संदेश यह गया कि बहुसंख्यक हिंदू समाज की सुरक्षा सत्ता की कृपा पर निर्भर है। नतीजतन हिंदू बंगालियों में असुरक्षा की भावना घर कर गई।
भ्रष्टाचार के आरोप
विभिन्न भर्ती घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों ने तृणमूल सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया। कई नेताओं और अधिकारियों पर लगे आरोपों ने जनता के एक वर्ग का भरोसा कमजोर किया।
रक्तचरित्र की छवि पर सवाल
बंगाल में राजनैतिक हिंसा व रक्तचरित्र कोई नई बात नहीं रही है। स्कूल-कॉलेज के स्टूडेंट यूनियन के चुनाव में भी बमबाजी होती रही है। ऐसे में राज्य में चुनावी हिंसा कोई बड़ी बात नहीं कही जा सकती। कई जगहों पर राजनीतिक हिंसा और टकराव की घटनाओं ने आम लोगों में असुरक्षा की भावना पैदा की। विपक्ष ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया।
भाजपा का उभार और ध्रुवीकरण की राजनीति
भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में आक्रामक प्रचार किया और खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश किया। धार्मिक पहचान की राजनीति और ध्रुवीकरण ने भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित किया। इसका असर खासकर उन इलाकों में देखा गया जहां पहले तृणमूल का मजबूत आधार माना जाता था।
युवाओं की बढ़ती अपेक्षाएं
बंगाली जनमानस की पहली प्राथमिकता रोजगार वो भी सरकारी नौकरी रहती है। गरीब और ग्रामीण वर्गों के लिए सरकार की कई योजनाएं जरूर थीं, लेकिन हर क्षेत्र में उनका लाभ समान रूप से नहीं पहुंच पाया। दूसरी तरफ युवाओं और नए मतदाताओं में रोजगार और बेहतर अवसरों की मांग लगातार बढ़ी, जो एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया।
क्या तृणमूल का पतन हो गया
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का पूरी तरह पतन हो रहा है, क्योंकि पार्टी अब भी राज्य की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत बनी हुई है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के उभार ने यह जरूर दिखा दिया है कि बंगाल की राजनीति तेजी से बदल रही है। तृणमूल कांग्रेस का पूरी तरह पतन नहीं हुआ है, लेकिन उसके जनाधार में दरारें जरूर दिखाई दे रही हैं। अगर पार्टी को भविष्य में मजबूत बने रहना है, अगर तृणमूल को भविष्य में अपनी पकड़ मजबूत रखनी है, तो उसे अपने शासन में पारदर्शिता लानी होगी। उसे अपनी छवि बदलनी होगी। भ्रष्टाचार, चुनावी हिंसा, रक्त चरित्र और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। और सबसे बड़ी बात युवाओं समेत सभी वर्गों का भरोसा जीतना होगा एक मजबूत विपक्ष के रूप में अपनी छवि गड़नी होगी। आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ममता बनर्जी सत्ता बचा पाएंगी या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या वे एक बार फिर बंगाल की जनता की उम्मीदों और राजनीतिक कल्पना का केंद्र बन पाएंगी। यही आने वाले समय की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा होगी।बंगाल की राजनीति में बदलाव की प्रक्रिया जारी है, और आने वाले वर्षों में यह और साफ होगा कि जनता किस दिशा में जाना चाहती है। क्योंकि बंगाल के बारे में ये कहावत सर्वविदित है कि बंगाल हो आज सोचता है, पूरा देश वो कल सोचता है।
