सोलन : भूपेंद्र ठाकुर ( TSN)-जटोली शिव मंदिर में एक ऐसा चमत्कारी कुंड है, जिसका जल ग्रहण करने से कंई असाध्य रोगों का नाश हो जाता है. वर्ष 1950 में जब आसपास का पूरा क्षेत्र सूखा हुआ करता था तो स्वामी कृष्णानंद परमहंस अपने तप से यहां पर जलधारा को प्रवाहित किया था,उसके बाद से यह जलधारा निरंतर यहां पर बह रही है।इस कुंड के पानी में कुछ औषधीय गुण हैं जो त्वचा रोगों का इलाज कर सकते हैं। मंदिर के अंदर एक गुफा है जहाँ स्वामी कृष्णानंद परमहंस जी रहते थे।
मंदिर के निर्माण में लगे थे 39 साल
अगर कोई पर्यटक पहाड़ी की चोटी पर स्थित भव्य और शानदार मंदिर देखना चाहता है तो जटोली शिव मंदिर उसके लिए सबसे उपयुक्त स्थान है। जटोली का नाम भगवान शिव की लंबी जटा (बाल) से पड़ा है। एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर माना जाने वाला यह मंदिर वास्तव में वास्तुकला का एक चमत्कार है। जटोली शिव मंदिर सोलन के प्रसिद्ध पवित्र स्थलों में से एक है जो बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है और शहर से केवल 6 किलोमीटर दूर है।
मंदिर ठेठ दक्षिणी-द्रविड़ शैली की वास्तुकला में बना है और तीन क्रमिक पिरामिडों से बना है। पहले पिरामिड पर भगवान गणेश की छवि देखी जा सकती है जबकि दूसरे पिरामिड पर शेष नाग की मूर्ति है। जटोली शिव मंदिर को एशिया का सबसे ऊंचा मंदिर होने का तमगा हासिल है; मंदिर के निर्माण में 39 साल लगे थे।
श्री श्री 1008 स्वामी कृष्णा नंद परमहंस महाराज ने की थी तपस्या
जटोली मंदिर की शुरूआत वैसे 1946 में यानी आजादी से पहले ही हो गई थी, जब श्री श्री 1008 स्वामी कृष्णा नंद परमहंस महाराज यहां वर्तमान पाकिस्तान से भ्रमण करने आए थे। जंगल में परमहंस महाराज को तप के लिए यह जगह बेहतर लगी। वह दिन भर कुंड वाले स्थान पर बैठकर तप करते और रात को गुफा में जाकर सो जाते थे। अब जहां उनकी कुटिया मौजूद हैं वहां किसी समय गडरिए विश्राम के लिए रुकते थे। कुछ समय बाद उन्होंने यहां लाल झंडा व नजदीक ही धूणा लगाया। लोगों को जब इसका पता चला तो वहां पहुंचने लगे। किंवदंती के अनुसार भगवान शिव की आराधना से महाराज परमहंस के पास भविष्यवाणी करने की दिव्य शक्ति थी। क्षेत्र में पानी की किल्लत को समझते हुए उन्होंने क्षेत्र में पानी के लिए तप किया और कुछ ही दिनों बाद वहां पानी की अटूट धारा बहने लगी। यह जलधारा अब भी हैं।
कहा जाता है कि बाबा परमहंस के मार्गदर्शन और दिशा-निर्देश पर ही जटोली शिव मंदिर का निर्माण 1980 में शुरू हुआ। 10 जुलाई 1983 को जब वह ब्रह्मलीन हुए तो उससे पहले ही उन्होंने मंदिर के लिए प्रबंधक समिति का गठन कर दिया था। पुजारी रमेश दत्त शर्मा को स्वामी जी ने पूजा-अर्चना का समय और दिशा-निर्देश दिया और समाधि में चले गए। अब समाधि पर उनकी मूर्ति बनी है और मूर्ति के ऊपर हंस रूपी मंदिर बनाया गया है। यह मंदिर भारत ही नहीं बल्कि एशिया में सबसे ऊंचा माना जाता है। इसकी ऊंचाई करीब 124 फुट है। स्वामी कृष्णानंद परमहंस ने यहां तपस्या के दौरान इस बात की भविष्यवाणी की थी कि यहां बनने वाले मंदिर के कारण हिमाचल का नाम देश ही नहीं विश्व में भी प्रसिद्ध होगा। उस समय मंदिर का निर्माण शुरू भी नहीं हुआ था। उनकी भविष्यवाणी अब सही साबित होने लगी है।
