Shimla,25 June-हिमाचल प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है।प्रदेश के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ओंकार शर्मा, जिनकी छवि ईमानदारी,कर्तव्यनिष्ठा और निष्पक्षता की मिसाल मानी जाती है,से अचानक सभी प्रमुख विभागों की जिम्मेदारी हटा दी गई है।अब उन्हें केवल जनजातीय विकास विभाग का अतिरिक्त मुख्य सचिव नियुक्त किया गया है।यह फैसला प्रशासनिक हलकों,विपक्षी दलों और आम नागरिकों के बीच गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहा है।
ओंकार शर्मा के पास गृह,वित्त,राजस्व और जल शक्ति जैसे प्रमुख विभागों की जिम्मेदारी थी। उनकी कार्यशैली को लंबे समय से निष्पक्ष और जनहितकारी माना जाता रहा है।उनका अचानक विभागों से हटाया जाना तब और भी अधिक ध्यान आकर्षित करता है जब हाल ही में इंजीनियर विमल नेगी की रहस्यमयी मृत्यु की जांच रिपोर्ट उन्होंने सरकार के निर्देश पर तैयार कर हाई कोर्ट में प्रस्तुत की थी।
प्रशासनिक व्यवस्था पर फिर छाया संशय
रिपोर्ट सौंपे जाने के तुरंत बाद ही उन्हें छुट्टी पर भेज दिया गया। यही नहीं,इस मामले से जुड़े अन्य दो अधिकारियों — एसपी संजीव गांधी और आईएएस हरिकेश मीणा — को भी छुट्टी पर भेजा गया था,लेकिन बाद में दोनों को क्रमशः बहाल या नई जिम्मेदारी सौंप दी गई। इसके विपरीत,ओंकार शर्मा को सभी महत्त्वपूर्ण विभागों से हटा देना कई सवालों को जन्म देता है।सरकार के इस कदम पर जनता की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। सोशल मीडिया पर हजारों लोगों ने ओंकार शर्मा के समर्थन में पोस्ट साझा किए। “क्या ईमानदारी अब हिमाचल में अपराध बन चुकी है?” जैसे सवाल वायरल हो गए। कांग्रेस सरकार की आलोचना करते हुए लोगों ने इसे एक ईमानदार अधिकारी के साथ अन्याय करार दिया।
विपक्षी दल भाजपा ने इस कार्रवाई को “ईमानदारी के खिलाफ साजिश” बताया और सरकार से स्पष्टीकरण की मांग की है। आईएएस शर्मा और उनकी पत्नी द्वारा साझा की गई एक भावनात्मक फेसबुक पोस्ट ने भी लोगों के दिलों को छू लिया, जिसमें उन्होंने अपने मन की पीड़ा व्यक्त की और जनता के समर्थन के लिए आभार जताया।अब तक सरकार की ओर से इस पूरे प्रकरण पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। न यह बताया गया कि शर्मा से विभाग क्यों छीने गए और न ही यह स्पष्ट हुआ कि केवल उन्हें ही सीमित भूमिका में क्यों रखा गया।
इस घटनाक्रम ने राज्य की नौकरशाही में यह संदेश दे दिया है कि यदि कोई अधिकारी बेखौफ होकर पारदर्शिता से काम करे और सत्ता के विरुद्ध सत्य को उजागर करे, तो उसे प्रशासनिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। यह मामला केवल एक अधिकारी का नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के पारदर्शिता और जवाबदेही के स्वरूप पर प्रश्नचिह्न है।अब जनता की निगाहें सरकार पर टिकी हैं — क्या वह इस फैसले पर कोई स्पष्टता लाएगी? या यह घटनाक्रम हिमाचल प्रदेश में ईमानदारी की राह में एक और चुनौती बनकर रह जाएगा?
