कुल्लू,मनमिंदर-:नगर क्षेत्र की रूमसू पंचायत का शरन गांव अब सिर्फ अपनी पारंपरिक काष्ठ कुणी शैली की वास्तुकला के लिए ही नहीं, बल्कि हथकरघा उत्पादों के लिए भी अपनी अलग पहचान बनाने की ओर बढ़ रहा है। वर्ष 2020 में भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय की ओर से शरन गांव को हैंडलूम विलेज का दर्जा मिलने के बाद यहां पारंपरिक हथकरघा कार्य को नई दिशा मिली है। कभी घरेलू जरूरतों तक सीमित रहने वाला यह काम अब महिलाओं के लिए आय का साधन बन रहा है।
शरन गांव में पहले ग्रामीण अपने इस्तेमाल के लिए पट्टू,शॉल, टोपी,मफलर और ऊन से तैयार होने वाले अन्य उत्पाद बनाते थे। इन उत्पादों का व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल सीमित था।लेकिन हैंडलूम विलेज बनने के बाद ग्रामीणों को अपने पारंपरिक हुनर को बाजार से जोड़ने का अवसर मिला।अब गांव की महिलाएं घर के काम और कृषि कार्यों के साथ हथकरघा उत्पाद तैयार कर उन्हें बाजार में बेच रही हैं। इससे परिवार की आमदनी में भी इजाफा हुआ है।
सर्वे के बाद मिला हैंडलूम विलेज का दर्जा
शरन गांव को हैंडलूम विलेज घोषित करने से पहले वस्त्र मंत्रालय की ओर से सर्वे करवाया गया था। इस दौरान गांव की पारंपरिक विरासत,स्थानीय जीवनशैली और हथकरघा से जुड़े कार्यों को देखा गया। सर्वे में सामने आया कि गांव के करीब 95 फीसदी घर काष्ठ कुणी शैली में बने हैं। इसके अलावा यहां लंबे समय से ग्रामीण शॉल, पट्टू, टोपी और अन्य हस्तनिर्मित उत्पाद तैयार करते आ रहे हैं। इन्हीं विशेषताओं के चलते शरन गांव को हैंडलूम विलेज के लिए उपयुक्त पाया गया और वर्ष 2020 में इसे यह दर्जा दिया गया।
महिलाओं को घर बैठे मिल रही अतिरिक्त आय
जमदग्नि स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिला सपना ठाकुर के अनुसार हैंडलूम विलेज बनने के बाद गांव में हथकरघा गतिविधियों में काफी बढ़ोतरी हुई है।पहले महिलाएं अपने घरों में हथकरघा का काम केवल निजी जरूरतों के लिए करती थीं,लेकिन अब तैयार उत्पादों को बेचने पर भी ध्यान दिया जा रहा है।सपना ठाकुर ने बताया कि वस्त्र मंत्रालय की ओर से गांव में बहुउद्देशीय भवन तैयार किया गया है। यहां स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं अपने हाथों से तैयार शॉल, पट्टू, टोपी, क्रोशिया के सामान और अन्य उत्पादों को प्रदर्शित कर बेच सकती हैं। इससे महिलाओं को अपने उत्पादों के लिए बेहतर मंच मिला है।हालांकि उनका कहना है कि अभी शरन गांव में पर्यटकों की आवाजाही अपेक्षाकृत कम है। गांव को हैंडलूम विलेज के रूप में देश और प्रदेश में व्यापक पहचान दिलाने के लिए पर्यटन विभाग और प्रशासन को प्रयास करने की जरूरत है। यदि पर्यटकों को गांव की पारंपरिक संस्कृति और यहां तैयार होने वाले स्थानीय उत्पादों की जानकारी मिले तो महिलाओं के कारोबार को और बढ़ावा मिल सकता है।
कृषि के साथ हथकरघा से जुड़ी महिलाएं
गांव की महिला दीक्षा ने बताया कि हैंडलूम विलेज बनने से पहले अधिकांश महिलाएं कृषि कार्यों में व्यस्त रहती थीं। हथकरघा का काम भी होता था, लेकिन यह मुख्य रूप से परिवार की जरूरतों तक सीमित था। अब महिलाएं कृषि कार्य निपटाने के बाद शॉल, पट्टू और क्रोशिया के उत्पाद तैयार करने में समय दे रही हैं।
दीक्षा के अनुसार हथकरघा के काम से महिलाओं को घर बैठे करीब 10 हजार से 15 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है। गांव के कई घरों में महिलाएं इस कार्य से जुड़ी हैं। इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है, बल्कि युवा पीढ़ी भी पारंपरिक हुनर सीखने के लिए आगे आ रही है।
नई मशीनों और उपकरणों से बढ़ा काम
महिला रजनी ने बताया कि बहुउद्देशीय भवन बनने के साथ उन्हें अपने उत्पाद बेचने के लिए सुविधा मिली है।पहले वह मुख्य रूप से पट्टू तैयार करती थीं,लेकिन वस्त्र मंत्रालय की ओर से खड्डी और अन्य उपकरण मिलने के बाद उन्होंने शॉल सहित कई दूसरे उत्पाद बनाना भी शुरू किया है।रजनी के अनुसार हैंडलूम विलेज बनने के बाद गांव में बुनियादी सुविधाओं में भी सुधार हुआ है। गांव के रास्तों को पक्का किया गया है और रास्तों पर लाइटें भी लगाई गई हैं।इससे स्थानीय लोगों को आवागमन में सुविधा मिली है।शरन गांव में हथकरघा अब सिर्फ परंपरा नहीं,बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम बन रहा है।यदि गांव को पर्यटन मानचित्र पर प्रमुखता से शामिल किया जाए और स्थानीय उत्पादों को बड़े बाजार से जोड़ा जाए,तो यहां की महिलाओं और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
