भावना, चंडीगढ़(TSN): चंडीगढ़ पीजीआई के डॉक्टर मरीज को गंभीर से गंभीर बीमारियों से बचने के लिए इलाज की नई नई तकनीक पर काम करते रहते हैं। क़ई ऐसी गंभीर बीमारियों के नादान की बहुत सी तकनीकें यहां डॉक्टरों की ओर से विकसित की गई हैं। वहीं एक बार फिर से पीजीआई के डॉक्टर ने मेडिकल साइंस के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की हैं। यहां डॉक्टर्स ने कुशिंग सिंड्रोम के निदान के लिए नई तकनीक विकसित की हैं।
कुशिंग सिंड्रोम के इलाज को लेकर पीजीआई की डॉ. रमा वालिया और डॉ. जया शुक्ला नई तकनीक पर काम कर रही हैं, जिसे कि उनके नाम पर पेटेंट करवाया जा रहा हैं। इसके इलाज को लेकर डॉ.रमा वालिया ने बताया कि कोर्टिसोल नाम का एक हार्मोन शरीर में मेटाबॉलिजम को नियंत्रित करता है और तनाव मिटाने में भी मदद करता हैं, लेकिन कभी- कभी, शरीर बहुत अधिक कोर्टिसोल बनाता है और इससे कुशिंग सिंड्रोम नामक बिमारी हो जाती हैं।
डॉ. वालिया की माने तो, ‘यह विभिन्न कारणों से हो सकता हैं। एक सामान्य कारण पिट्यूटरी ग्रंथि में एक छोटा ट्यूमर है जिसे कॉर्टिकोट्रोपिनोमा कहा जाता है, जो एक विशिष्ट प्रकार के कुशिंग सिंड्रोम का कारण बनता है, जिसे कुशिंग रोग कहा जाता हैं। इस रोग के इलाज के लिए CRH-PET/CT और M-Desmo-PET/CT दो अणुओं में से CRH और M-Desmo का आविष्कार किया जा रहा हैं और डॉ. रमा वालिया और डॉ. जया शुक्ला के नाम पर इसे पेटेंट करवाया जा रहा हैं।
कुशिंग सिंड्रोम के रोगियों में कॉर्टिकोट्रोपिनोमा की कल्पना करने के लिए इन अणुओं का उपयोग करके PET-CT इमेजिंग एंडोक्रिनोलॉजी, न्यूक्लियर मेडिसन, रेडियोलॉजी और न्यूरोसर्जरी विभाग के सहयोग से की जा रही हैं। नवीनता कॉर्टिकोट्रोपिनोमा को तीन आयामों में सटीक रूप से देखने और स्थानीयकृत करने की उनकी क्षमता में निहित है जो वास्तव में ट्यूमर को ऑपरेशन से हटाने में मदद करती हैं। ऐसा तकनीक के विकसित होने से इस सिंड्रोम से जूझ रहे व्यक्तियों के इलाज में काफी मदद मिलेगी।
