राहुल चावला, पालमपुर-:धौलाधार की मनमोहक वादियों में स्थित सीएसआईआर–हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएचबीटी) पालमपुर का ट्यूलिप गार्डन एक बार फिर रंग-बिरंगे फूलों से सजकर पर्यटकों के स्वागत के लिए तैयार है। हिमाचल प्रदेश का पहला और देश का दूसरा ट्यूलिप गार्डन इस वर्ष भी दर्शकों के लिए खोल दिया गया है। कश्मीर के बाद यह देश का दूसरा प्रमुख ट्यूलिप गार्डन है, जिसने कुछ ही वर्षों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना ली है।
इस बार 50 हजार पौधों की छह किस्में खिला रहीं है रंग
इस बार गार्डन में ट्यूलिप की छह विभिन्न किस्मों के करीब 50 हजार बल्ब लगाए गए हैं, जो इन दिनों पूरे शबाब पर खिल रहे हैं। लाल, पीले, गुलाबी, बैंगनी और सफेद रंगों के ट्यूलिप फूल पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर रहे हैं। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पालमपुर में यह गार्डन पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ फूलों की खेती के क्षेत्र में नई संभावनाएं भी खोल रहा है।
आईएचबीटी संस्थान ने केंद्र सरकार और सीएसआईआर द्वारा वर्ष 2022 में शुरू किए गए फ्लोरीकल्चर मिशन के तहत फूलोत्पादन को प्रोत्साहित करने की दिशा में अहम कदम उठाए हैं। इस पहल का उद्देश्य स्थानीय किसानों को आधुनिक तकनीकों से जोड़कर उनकी आय में वृद्धि करना है। संस्थान किसानों को ट्यूलिप की वैज्ञानिक खेती, बल्ब उत्पादन और विपणन की जानकारी देकर आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रहा है।
गौरतलब है कि हालैंड विश्व में ट्यूलिप बल्ब उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है और अधिकांश देश वहीं से बल्ब आयात करते रहे हैं। भारत भी लंबे समय तक हालैंड पर निर्भर रहा है, लेकिन अब आईएचबीटी के वैज्ञानिकों ने देश में ही ट्यूलिप बल्ब उत्पादन की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। इससे आयात पर निर्भरता कम होने के साथ-साथ देश में फूलों की खेती को नई दिशा मिल रही है।
दिल्ली में खिले हिमालयी ट्यूलिप
संस्थान के निदेशक डॉ. सुदेश कुमार यादव ने बताया कि जब से ट्यूलिप गार्डन की शुरुआत हुई है, तब से अब तक चार लाख से अधिक दर्शक इसे देखने आ चुके हैं। पिछले वर्ष लगभग एक लाख लोगों ने गार्डन का भ्रमण किया था और इस वर्ष भी एक लाख से अधिक पर्यटकों के आने की संभावना जताई जा रही है। उन्होंने कहा कि यह गार्डन केवल पर्यटन आकर्षण नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचार का भी केंद्र बनता जा रहा है।डॉ. यादव ने बताया कि संस्थान कई कंपनियों के साथ मिलकर ट्यूलिप बल्ब उत्पादन पर कार्य कर रहा है। ऑफ-सीजन ट्यूलिप उत्पादन की दिशा में भी प्रयोग किए जा रहे हैं, ताकि सालभर फूल उपलब्ध कराए जा सकें। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि इस वर्ष दिल्ली स्थित सीएसआईआर मुख्यालय में एक हजार से अधिक ट्यूलिप लगाए गए हैं, जिन्हें आम जनता के लिए खोला गया है। इसके अतिरिक्त नई दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी) के साथ हुए समझौते के तहत संस्थान ने इस वर्ष 22 हजार ट्यूलिप बल्ब उपलब्ध कराए हैं, जिनसे राजधानी में भी हिमालयी ट्यूलिप की छटा देखने को मिल रही है।
संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. भव्य भार्गव ने बताया कि इस वर्ष ट्यूलिप की छह किस्मों के 50 हजार बल्ब लगाए गए हैं। उन्होंने कहा कि पिछले वर्षों की तुलना में इस बार और अधिक संख्या में पर्यटकों के आने की उम्मीद है। संस्थान में ट्यूलिप पर व्यापक शोध कार्य किया जा रहा है, जिसमें कम समय में फूल तैयार करने और स्थानीय जलवायु के अनुकूल किस्में विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।डॉ. भार्गव ने कहा कि ट्यूलिप बल्ब का आयात कम करने के लिए संस्थान ने दीर्घकालिक लक्ष्य तय किया है। अगले पांच वर्षों में 23 लाख ट्यूलिप बल्ब तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके लिए वैज्ञानिक लगातार प्रयासरत हैं। यदि यह लक्ष्य हासिल होता है तो देश में ट्यूलिप उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ी उपलब्धि होगी।पालमपुर का ट्यूलिप गार्डन न केवल पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन चुका है, बल्कि यह वैज्ञानिक नवाचार, कृषि विविधीकरण और किसानों की आय वृद्धि का भी प्रतीक बनकर उभर रहा है। धौलाधार की गोद में खिले ये रंग-बिरंगे ट्यूलिप हिमाचल की सुंदरता में चार चांद लगा रहे हैं और प्रदेश को नई पहचान दिला रहे हैं।
