मोहित प्रेम शर्मा
भारतीय राजनीति में ऐसे कई नेता हैं जिनकी प्रतिभा समय से पहले पहचानी जाती है,लेकिन परिस्थितियाँ उन्हें वह मुकाम तुरंत नहीं देतीं जिसके वे असली हकदार होते हैं।जगत प्रकाश नड्डा (JP Nadda)भी ऐसी ही एक कहानी हैं—जो मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए,लेकिन फिर देश के स्वास्थ्य मंत्री से लेकर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक का सफर तय किया।
पटना से शिमला और राजनीति की बुनियाद
जेपी नड्डा का जन्म 2 दिसंबर 1960 को पटना (बिहार) में हुआ।उनके पिता प्रोफेसर नारायण लाल नड्डा शिक्षाविद् थे। बचपन से अनुशासित और विचारशील रहे नड्डा की शिक्षा शिमला के सेंट एडवर्ड स्कूल और फिर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से हुई। यहीं से वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े और राजनीति की ठोस बुनियाद रखी।
हिमाचल में राजनीतिक पारी और ‘धूमल फैक्टर’
1993 में नड्डा पहली बार विधायक बने।1998 में प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार में उन्हें वन मंत्री बनाया गया।युवा,ऊर्जावान और नीतिपरक सोच रखने वाले नड्डा जल्द ही जनता और संगठन में लोकप्रिय हो गए।लेकिन यही लोकप्रियता एक अंतर्विरोध का कारण बनी।पार्टी में एक वर्ग,खासकर प्रेम कुमार धूमल खेमे—नड्डा के तेजी से बढ़ते कद को खतरे के रूप में देखने लगा।जब 2007 में भाजपा दोबारा सत्ता में आई,तो नड्डा को मंत्री तो बनाया गया,लेकिन धीरे-धीरे संगठन में उन्हें किनारे किया जाने लगा।2012 में जब मुख्यमंत्री पद के लिए दौड़ शुरू हुई,नड्डा सबसे योग्य चेहरे माने जा रहे थे,लेकिन धूमल गुट ने बाजी मार ली।कहा जाता है,नड्डा को ‘मुख्यमंत्री बनने से रोकने’ के लिए भीतरघात और रणनीतिक दवाब का खेल खेला गया।मुख्यमंत्री पद से दूर किए जाने के बाद,नड्डा हिमाचल की सक्रिय राजनीति से अलग हो गए।लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उनकी संगठनात्मक क्षमताओं को पहचाना और उन्हें दिल्ली बुला लिया।
नोएडा स्थित पार्टी कार्यालय से नड्डा ने भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में बड़ी भूमिका निभाई।
पार्टी के लिए विधानसभा चुनाव प्रबंधन,नीति निर्धारण, और संघ समन्वय जैसे मामलों में वे अमित शाह और नरेंद्र मोदी की पहली पसंद बनते गए।
स्वास्थ्य मंत्री के रूप में सशक्त पहचान
2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद नड्डा को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री बनाया गया।उन्होंने आयुष्मान भारत योजना,टीकाकरण मिशन,और सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई।कोविड-19 महामारी के दौरान भले वे मंत्री नहीं थे,लेकिन भाजपा के संगठनात्मक मोर्चे पर टीकाकरण जागरूकता, सेवा ही संगठन अभियान की निगरानी में उनका बड़ा योगदान रहा।
भाजपा अध्यक्ष बनना: धैर्य का फल
2020 में,जब अमित शाह गृहमंत्री बने,तो भाजपा अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी जेपी नड्डा को सौंपी गई।उनके अध्यक्ष रहते भाजपा ने कई राज्य चुनाव जीते,पार्टी की विचारधारा को मजबूत किया,और युवा नेताओं को अवसर देने की नीति अपनाई।
जेपी नड्डा की कहानी बताती है कि राजनीति में सिर्फ पद ही नहीं, दृष्टि, धैर्य और संगठन कौशल भी मायने रखते हैं।
मुख्यमंत्री भले न बन पाए, लेकिन पार्टी अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने जो मुकाम हासिल किया है, वह कई मुख्यमंत्रियों से बड़ा है।
एक पंक्ति में कहें तो
जेपी नड्डा वो नेता हैं,जिन्हें रोका गया था मुख्यमंत्री बनने से, लेकिन वे रुकने वाले नहीं थे।उन्होंने रास्ता बदला,दिशा नहीं — और आज भाजपा की रणनीतिक रीढ़ बन चुके हैं।
