सिख रेफरेंस लाइब्रेरी के नुकसान को संस्कृति मंत्री ने बताया दुर्भाग्यपूर्ण, बहाली के विकल्प तलाशेगी सरकार

नई दिल्ली, 12 मार्च:केंद्र सरकार ने 1984 में ऑपरेशन ब्लूस्टार के दौरान अमृतसर स्थित श्री हरमंदिर साहिब परिसर में मौजूद सिख रेफरेंस लाइब्रेरी को हुए नुकसान को गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण घटना बताते हुए इसके पुनर्स्थापन की संभावनाओं पर विचार करने की बात कही है। केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने संसद में कहा कि सरकार आधुनिक डिजिटल तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अन्य वैज्ञानिक तरीकों की मदद से क्षतिग्रस्त ऐतिहासिक पांडुलिपियों और साहित्य को सुरक्षित करने और पुनर्जीवित करने के विकल्पों पर काम कर सकती है।
राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान यह मुद्दा उठाया गया, जब सांसद सतनाम सिंह संधू ने अमृतसर के श्री हरमंदिर साहिब परिसर में स्थित सिख रेफरेंस लाइब्रेरी में 1984 की घटनाओं के दौरान हुए नुकसान और वहां मौजूद दुर्लभ पांडुलिपियों के भविष्य को लेकर सवाल किया। इस पर जवाब देते हुए संस्कृति मंत्री ने कहा कि भारत की प्राचीन पांडुलिपियों और ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने के लिए केंद्र सरकार कई स्तरों पर काम कर रही है और नई तकनीकों के जरिए ऐसे दस्तावेजों के संरक्षण की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।केंद्रीय मंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा शुरू किए गए “ज्ञान भारतम मिशन” का उद्देश्य देश की पांडुलिपि विरासत को सुरक्षित करना, उन्हें डिजिटल स्वरूप में संरक्षित करना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि इस मिशन के तहत देशभर में मौजूद दुर्लभ पांडुलिपियों को डिजिटल तकनीक के माध्यम से सुरक्षित करने और जहां संभव हो, वहां उन्हें तकनीकी सहायता से पुनर्स्थापित करने की योजना है।उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास में कई बार प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं के कारण महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और बौद्धिक धरोहरों को नुकसान पहुंचा है। ऐसे में सरकार का प्रयास है कि बची हुई सामग्री को आधुनिक साधनों की मदद से सुरक्षित रखा जाए ताकि भविष्य में इस तरह की विरासत को संरक्षित किया जा सके।
सांसद सतनाम सिंह संधू ने संसद में सिख रेफरेंस लाइब्रेरी के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह लाइब्रेरी वर्ष 1946 में स्थापित की गई थी और इसमें सिख इतिहास, धर्म और साहित्य से जुड़ी बड़ी संख्या में दुर्लभ पांडुलिपियां और पुस्तकें सुरक्षित रखी गई थीं। उनके अनुसार इस लाइब्रेरी में लगभग 20,000 दुर्लभ पांडुलिपियां, हस्तलिखित धार्मिक ग्रंथ, ऐतिहासिक दस्तावेज और सिख गुरुओं से जुड़े साहित्य का विशाल संग्रह मौजूद था।उन्होंने कहा कि 1984 में ऑपरेशन ब्लूस्टार के दौरान जब दरबार साहिब परिसर में सैन्य कार्रवाई हुई, तब अकाल तख्त को भारी नुकसान पहुंचा और उसी दौरान सिख रेफरेंस लाइब्रेरी भी आग की चपेट में आ गई। संधू के अनुसार इस घटना में कई दुर्लभ पांडुलिपियां, धार्मिक ग्रंथ और ऐतिहासिक दस्तावेज नष्ट हो गए या फिर बाद में उनका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड सामने नहीं आया।
राज्यसभा सदस्य ने इस मुद्दे को भारत की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा गंभीर विषय बताते हुए कहा कि आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों की मदद से इन दस्तावेजों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा सकता है। उन्होंने विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजिंग जैसी तकनीकों के उपयोग का सुझाव दिया, जिनके माध्यम से जले या क्षतिग्रस्त दस्तावेजों के अक्षरों और सामग्री को आंशिक रूप से पढ़ने और पुनर्स्थापित करने की संभावना रहती है।
संधू ने कहा कि विश्व के कई देशों में पुरानी और क्षतिग्रस्त पांडुलिपियों को संरक्षित करने के लिए इसी तरह की उन्नत तकनीकों का सफल उपयोग किया जा चुका है। ऐसे में भारत में भी सिख रेफरेंस लाइब्रेरी की पांडुलिपियों के मामले में इसी तरह का एक विशेष डिजिटल रिकवरी प्रोजेक्ट शुरू किया जा सकता है।उन्होंने यह भी कहा कि यह घटना भारतीय इतिहास में ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को हुए बड़े नुकसान के रूप में देखी जाती है। संधू ने इस नुकसान की तुलना प्राचीन विश्वविद्यालयों में ज्ञान की हानि से करते हुए कहा कि इतिहास में कई बार ऐसी घटनाएं हुई हैं जब महत्वपूर्ण पुस्तकालय और ज्ञान केंद्र नष्ट हो गए, जिससे सभ्यता की बौद्धिक संपदा को गहरा आघात पहुंचा।
केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने सांसद द्वारा उठाए गए इस विषय को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करेगी। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में सांसद सतनाम सिंह संधू के साथ इस विषय पर विस्तार से चर्चा की जाएगी ताकि यह समझा जा सके कि उपलब्ध तकनीकों के जरिए किस प्रकार आगे बढ़ा जा सकता है।मंत्री ने यह भी संकेत दिया कि यदि तकनीकी रूप से संभव हुआ तो सिख रेफरेंस लाइब्रेरी से जुड़ी क्षतिग्रस्त पांडुलिपियों और दस्तावेजों को डिजिटल रूप में संरक्षित करने और पुनर्स्थापित करने के लिए विशेष पहल की जा सकती है। उनका कहना था कि देश की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।
गौरतलब है कि सांसद सतनाम सिंह संधू इससे पहले भी संसद में सिख रेफरेंस लाइब्रेरी से लापता पांडुलिपियों और हस्तलिखित धार्मिक ग्रंथों का मुद्दा उठा चुके हैं। दिसंबर 2024 में संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान उन्होंने विशेष उल्लेख के माध्यम से इस विषय को सदन के सामने रखा था।उस समय उन्होंने कहा था कि सिख रेफरेंस लाइब्रेरी में सिख गुरुओं, संतों और विद्वानों द्वारा लिखित कई दुर्लभ ग्रंथ मौजूद थे, जिनमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब की हस्तलिखित प्रतियां भी शामिल थीं। उन्होंने यह भी कहा था कि इन पांडुलिपियों के नुकसान और उनकी वर्तमान स्थिति को लेकर अब तक स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आ सकी है।
संधू के अनुसार मीडिया रिपोर्टों और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के आंकड़ों के मुताबिक लाइब्रेरी में 12,613 दुर्लभ पुस्तकें और लगभग 512 पांडुलिपियां मौजूद थीं। 1984 की घटनाओं के बाद से कई सिख संगठनों और संस्थाओं ने इस विषय को विभिन्न मंचों पर उठाया है और इन दस्तावेजों की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि इस ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के मुद्दे पर गंभीर पहल की जाए, ताकि सिख इतिहास और साहित्य से जुड़ी इस महत्वपूर्ण धरोहर को यथासंभव सुरक्षित किया जा सके और भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित रखा जा सके।

Ekta TSN

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