Delhi, 15 December-:छावनी परिषदों के सिविल क्षेत्रों को नगर निकायों में शामिल किए जाने की प्रक्रिया में हो रही देरी को लेकर लोकसभा में चिंता व्यक्त की गई है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सांसद सुरेश कुमार कश्यप ने नियम 377 के तहत इस विषय को सदन के संज्ञान में लाते हुए इसे जनता के तात्कालिक और महत्वपूर्ण हित से जुड़ा मुद्दा बताया।
सांसद सुरेश कश्यप ने कहा कि रक्षा मंत्रालय द्वारा वर्ष 2022 में छावनी परिषदों के सिविल क्षेत्रों को संबंधित राज्यों की नगर पालिकाओं और नगर निगमों में विलय करने की प्रक्रिया प्रारंभ की गई थी। इसके तहत सर्वेक्षण, जनसुनवाई और प्रारूप अधिसूचनाओं जैसे कई आवश्यक चरण पूरे किए जा चुके हैं। इसके बावजूद, लगभग तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी इस प्रक्रिया को अंतिम रूप नहीं दिया जाना चिंताजनक है।उन्होंने कहा कि इस देरी का सीधा प्रभाव छावनी क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों पर पड़ रहा है। विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में नागरिक पूर्ण नगरपालिका अधिकारों से वंचित हैं, जिससे उन्हें शहरी सुविधाओं और बुनियादी सेवाओं का लाभ अन्य क्षेत्रों की तुलना में नहीं मिल पा रहा है। जलापूर्ति, सड़क, सफाई, स्ट्रीट लाइट और अन्य नागरिक सुविधाओं के विकास में भी बाधाएं उत्पन्न हो रही हैं।
सुरेश कश्यप ने यह भी कहा कि विलय प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट समय-सीमा न होने से स्थानीय प्रशासन के सामने असमंजस की स्थिति बनी हुई है। इससे न केवल विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि स्थानीय नागरिकों में असंतोष भी बढ़ रहा है।उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि छावनी परिषदों के सिविल क्षेत्रों को नगर निकायों में विलय करने की प्रक्रिया को प्राथमिकता के आधार पर शीघ्र पूरा किया जाए। साथ ही आवश्यक अंतिम अधिसूचनाएँ जल्द जारी की जाएँ, ताकि छावनी क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को भी अन्य शहरी क्षेत्रों की तरह पूर्ण नगरपालिका अधिकार, सुविधाए और विकास के समान अवसर प्राप्त हो सकें।
