Shimla,11 July-देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजनाएं—आयुष्मान भारत और हिमाचल की हिम केयर—अब ज़मीनी हकीकत में आम आदमी के लिए किसी काम की नहीं रहीं। IGMC शिमला जैसे बड़े सरकारी अस्पताल में ये योजनाएं नाम की रह गई हैं, इलाज की नहीं। मरीज कार्ड लेकर अस्पताल आते हैं, लेकिन या तो इलाज से मना कर दिया जाता है या गुमराह किया जाता है।
कार्ड हैं,इलाज नहीं:दोहरी मार
IGMC की दीवारों पर तो इन योजनाओं का जोरदार प्रचार है,लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है। 9 जुलाई को कार्डियोलॉजी विभाग में भर्ती एक मरीज के परिजनों ने बताया,“आयुष्मान कार्ड दिखाया तो कहा गया – इस पर इलाज नहीं होगा। हिम केयर कार्ड बनाओ।जब हिम केयर कार्ड बनवाया, तो जवाब मिला – इस पर भी सुविधा नहीं है।”
इलाज के नाम पर ₹91,000 का झटका
मरीज के गरीब परिवार को करीब ₹91,000 का बिल भरना पड़ा, जबकि उन्होंने उम्मीद से दोनों कार्ड बनवा रखे थे। दिहाड़ी मजदूर इस खर्च को कैसे उठाएंगे, इसका जवाब किसी के पास नहीं।
अधिकारी बोले कुछ और हकीकत निकली कुछ और
IGMC के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. राहुल रॉय का कहना है कि“आयुष्मान पर इलाज बंद है,लेकिन हिम केयर कार्ड मान्य है।”लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि हिम केयर कार्ड पर भी इलाज नहीं मिल रहा। मरीजों को एक कार्ड रद्द कर दूसरा बनवाने को कहा जाता है और फिर दोनों को खारिज कर दिया जाता है।
सिस्टम ठप,मरीज बेहाल
रोजाना सैकड़ों मरीज और उनके परिवार ऐसे ही हालात से गुजर रहे हैं।अस्पताल प्रशासन से जब सवाल पूछे जाते हैं, तो कोई ठोस जवाब नहीं मिलता।फंड की कमी,प्रक्रिया की उलझन और जवाबदेही का अभाव – यही इन योजनाओं की सच्चाई बन गई है।
कुछ जरूरी सवाल–जो सरकार से पूछे जाने चाहिए:
केंद्र और राज्य सरकार फंड रिलीज क्यों नहीं कर रही?
मरीजों को पहले से सटीक जानकारी क्यों नहीं दी जाती?
जिनके पास कार्ड हैं,उन्हें दोबारा क्यों दौड़ाया जाता है?
प्रशासन मरीजों की मदद के बजाय चुप क्यों बैठा है?
जब इलाज भी‘सिस्टम’ के रहमो-करम पर हो,तो गरीब कहां जाए?
सरकार को ये तय करना होगा कि क्या ये योजनाएं लोगों की मदद के लिए हैं या केवल प्रचार के लिए।अगर पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता नहीं होगी,तो ये योजनाएं सिस्टम की नाकामी का चेहरा बन जाएंगी।
