Mandi,dharamveer(TSN)–मंडी के सरकाघाट उपमंडल के गांव सरस्कान निवासी और जेल रोड,मंडी शहर में रहने वाले सूबेदार मेजर ऑनरेरी कैप्टन अच्छर सिंह ने 102 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली।लेकिन उनकी अंतिम इच्छा ने उन्हें मृत्यु के बाद भी जीवित कर दिया– उन्होंने अपना पार्थिव शरीर श्री लाल बहादुर शास्त्री मेडिकल कॉलेज, नेरचौक को देहदान के रूप में समर्पित किया।
एक जीवन,जो युद्ध से मानव सेवा तक समर्पित रहा 12 अप्रैल 1923 को जन्मे अच्छर सिंह ने 1940 से 1969 तक भारतीय सेना में सेवाएं दीं।उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सिग्नल कोर में बसरा,काहिरा,सिसिली और रंगून जैसे युद्धक्षेत्रों में बहादुरी दिखाई।1965 के भारत-पाक युद्ध में भी उनका योगदान अविस्मरणीय रहा।उन्हें रक्षा पदक 1965 सहित कुल 8 वीरता पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
सेवा से सेवानिवृत्ति नहीं होती
रिटायरमेंट के बाद भी वे देशसेवा से दूर नहीं हुए।उन्होंने जालंधर और आईआईटी कानपुर में एनसीसी प्रशिक्षक के रूप में युवाओं को अनुशासन और देशभक्ति की शिक्षा दी।वर्ष 2007 में उन्होंने देहदान का निर्णय लिया था – पहले यह IGMC शिमला के लिए था,जिसे बाद में नेरचौक मेडिकल कॉलेज में स्थानांतरित किया गया।
परिवार ने निभाई सेवा की विरासत
उनके पुत्र एम.सिंह (सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी) ने बताया कि पिता की अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए,परिवार ने गांववालों और रेडक्रॉस संस्था की सहायता से पार्थिव शरीर को मेडिकल कॉलेज पहुंचाया,ताकि वह चिकित्सा अनुसंधान और प्रशिक्षण में काम आ सके।
एक फौजी की अंतिम सलामी:मौत के बाद भी देश के काम आया
सूबेदार मेजर ऑनरेरी कैप्टन अच्छर सिंह का जीवन इस बात का प्रमाण है कि देशसेवा केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं होती।उन्होंने यह दिखाया कि सेवा शरीर के समाप्त होने के बाद भी जारी रह सकती है।उनका जीवन और देहदान आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष, समर्पण और सेवा का प्रतीक बन गया है।
